10 साल से चाय बनाकर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन रहा संतोष
बिना हथेलियों के भी लिखी अपनी तकदीर
छिंदवाड़ा (लगी क्या)। किस्मत सिर्फ हाथों की लकीरों से तय नहीं होती—कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो हालात की सबसे बड़ी मार सहकर भी अपनी तकदीर खुद गढ़ते हैं। हर्रई के रहने वाले संतोष कहार उन्हीं जिंदादिल लोगों में से एक हैं, जिनकी कहानी हार मानने वालों के लिए आईना और जूझने वालों के लिए प्रेरणा है।
करीब 20 साल पहले खेत में फसल की थ्रेसर मशीन पर मजदूरी करते वक्त एक भयावह हादसे ने संतोष की जिंदगी को झकझोर दिया। मशीन की चपेट में आकर उन्होंने अपने दोनों हाथों के पंजे गंवा दिए। वह पल ऐसा था, जब लगा कि जिंदगी यहीं थम जाएगी।
कुछ समय के लिए निराशा ने घेर लिया, लेकिन संतोष ने हालात के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया। उन्होंने यह तय कर लिया कि हाथ नहीं होने को कमजोरी नहीं बनने देंगे।
संघर्षों के बीच उन्होंने छोटे-छोटे काम किए, खुद को संभाला और आखिरकार अमरवाड़ा के एक निजी होटल में काम का मौका मिला। आज करीब 10 वर्षों से संतोष उसी होटल में चाय बना रहे हैं। इतनी सफाई, मेहनत और लगन के साथ कि देखने वाले दंग रह जाते हैं।
होटल संचालक विजय पटवा गर्व से कहते हैं—
“संतोष को काम करते देख कभी महसूस ही नहीं होता कि उसके हाथ नहीं हैं। उसकी मेहनत, ईमानदारी और जिम्मेदारी कई सामान्य लोगों से कहीं ज्यादा है।”
आज संतोष कहार उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं, जो छोटी-सी परेशानी आते ही हार मान लेते हैं।
उनकी जिंदगी यह सिखाती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो हालात भी झुक जाते हैं, और बिना हथेलियों के भी तकदीर की इबारत लिखी जा सकती है।
जरा हट के…
प्रवीण काटकर
9424300567





