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“जिंदा रहते सड़क का इंतजार, मरने के बाद भी कीचड़ में अंतिम सफर !”

श्मशान तक आधा किलोमीटर रास्ता नहीं, बंधान गांव में विकास के दावों की खुली पोल

छिंदवाड़ा (लगी क्या)। आजादी के 80 साल बाद भी अगर किसी गांव में इंसान को मरने के बाद भी सम्मानजनक अंतिम यात्रा नसीब न हो, तो यह सिर्फ बदहाली नहीं, बल्कि विकास के दावों पर बड़ा सवाल है। बिछुआ ब्लॉक के पाथरी पंचायत अंतर्गत बंधान गांव में श्मशान घाट तक सड़क नहीं होने से ग्रामीणों को हर अंतिम यात्रा में कीचड़ और फिसलन से जूझना पड़ रहा है।
करीब 800 की आबादी और 500 से अधिक मतदाताओं वाले इस आदिवासी बहुल गांव में श्मशान घाट मुख्य मार्ग से करीब आधा किलोमीटर दूर है। लेकिन इस दूरी को तय करने के लिए आज भी ग्रामीणों के पास पक्की सड़क नहीं है। बारिश होते ही रास्ता कीचड़ में तब्दील हो जाता है और अंतिम यात्रा एक बेहद कठिन सफर बन जाती है।

जिंदगीभर इंतजार… मौत के बाद भी रास्ता नहीं

सबसे मार्मिक स्थिति तब बनती है, जब गांव में किसी व्यक्ति की मौत होती है। परिजनों और ग्रामीणों को शव को कंधे पर उठाकर कीचड़ भरे, फिसलन वाले रास्ते से श्मशान तक ले जाना पड़ता है। बारिश के दौरान कई जगह पैर जमाना तक मुश्किल हो जाता है। अंतिम यात्रा में शामिल लोगों की मजबूरी कैमरे में भी कैद हुई है।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। श्मशान तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक रास्ता निकालने का प्रयास भी किया गया, लेकिन रास्ता वन क्षेत्र से गुजरने के कारण वन विभाग की अनुमति का पेंच सामने आ गया।

विकास के दावों के बीच आधा किलोमीटर की हकीकत –

सरकार गांव-गांव सड़क और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के दावे करती है, लेकिन बंधान गांव में श्मशान तक पहुंचने के लिए भी सड़क का इंतजार खत्म नहीं हुआ। ग्रामीणों का सवाल है कि जब अंतिम यात्रा के लिए भी रास्ता नहीं मिल पा रहा, तो विकास के बड़े-बड़े दावों की हकीकत आखिर क्या है ?
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि वन विभाग से समन्वय कर जल्द से जल्द श्मशान घाट तक सड़क निर्माण का रास्ता निकाला जाए। कम से कम किसी ग्रामीण की अंतिम यात्रा बारिश के कीचड़ में कंधों पर उठाकर न निकालनी पड़े—इतनी सुविधा तो गांव को मिलनी ही चाहिए।

जरा हट के…

प्रवीण काटकर

9424300567