बड़ी कुर्सियों की सेफ़्टी, छोटे कर्मचारियों की कुर्बानी—वन विभाग में वही पुरानी कहानी
छिंदवाड़ा (लगी क्या)। वन विभाग में चल रहा खेल किसी से छुपा नहीं है। रेंजर, एसडीओ और डीएफओ के इशारों पर अधीनस्थ कर्मचारी काम करते हैं, लेकिन जब गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने के नाम पर सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर गाज गिरा दी जाती है। बड़े अधिकारी खुद को बचाकर उल्टा ‘कठोर कार्रवाई’ का तमगा पहन लेते हैं।
पश्चिमी वन मंडल का ताज़ा मामला भी यही बताता है। आरोप है कि अधिकारियों ने वनरक्षक से पूरे खेल को अंजाम दिलवाया, और जैसे ही मामला तूल पकड़ने लगा, उसी वनरक्षक को निलंबित कर बलि का बकरा बना दिया गया। उधर अधिकारी इस कार्रवाई को अपनी ‘तुरंत और कड़ी कार्रवाई’ बताकर वाहवाही लूटने में लगे हैं।
विभाग के अंदरूनी कर्मचारी कहते हैं—
“जो खेल लिखते हैं, वे बच जाते हैं… और जो खेलते हैं, वही पकड़े जाते हैं।” जबकि स्थापना शाखा के कुछ शातिर कर्मचारी भी इस पूरे मामले में शामिल हैं लेकिन उन्हें भी बचाने का प्रयास साहब कर रहे हैं।
देलाखारी में भी हुआ बड़ा खेल –
इसी तरह से उत्पादन वन मंडल की देलाखारी रेंज में भी कुछ ऐसा ही हुआ है, जहां पिछले कुछ सालों से पदस्थ अधिकारियों ने अपने शातिर और चहेते वनरक्षकों से काम करवाया और कमीशन लेने के बाद चुप बैठ गए, अब कर्मचारी इस पूरे मामले में फसते नजर आ रहे हैं। इस मामले में अधिकारी अब यह कहते नहीं चूक रहे हैं कि उनका तो कुछ नहीं होगा।
जरा हट के…
प्रवीण काटकर
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