सरकारी दौरे के बाद चिकन की फरमाइश, कर्मचारी बने जबरन मेजबान
छिंदवाड़ा (लगी क्या)। जिले के एक सरकारी विभाग (स्वास्थ्य) के बड़े साहब इन दिनों निरीक्षण कम और अपनी मौज-मस्ती को लेकर ज्यादा सुर्खियों में हैं। कागजों में यह दौरे प्रशासनिक कसावट और कामकाज की समीक्षा के नाम पर होते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कह रही है।
सूत्रों के मुताबिक बड़े साहब निरीक्षण के दौरान पहले कमियां गिनाते हैं, फाइलों और टारगेट पर नाराजगी जाहिर करते हैं और फिर ‘दिशा-निर्देश’ देते हुए अधीनस्थ अधिकारियों व कर्मचारियों से चिकन और शराब की व्यवस्था कराने की फरमाइश कर डालते हैं। निरीक्षण खत्म होते-होते पूरा सरकारी दौरा निजी दावत में तब्दील हो जाता है।
इस रवैये से विभाग के कर्मचारी भीतर ही भीतर उबल रहे हैं। एक तरफ साहब की नाराजगी का डर, दूसरी तरफ उनकी जेब से खर्च, कर्मचारी मजबूरी में इस खेल का हिस्सा बन रहे हैं। विरोध की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा, क्योंकि साहब की नाराजगी का असर सर्विस रिकॉर्ड, पोस्टिंग और भविष्य पर पड़ने का डर सता रहा है।
विभाग में इस ‘निरीक्षण संस्कृति’ को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। सवाल साफ है,
क्या निरीक्षण जनता के काम सुधारने, हितग्राहियों के लिए होता है या फिर सरकारी पद की आड़ में शराब-कबाब की दावत उड़ाने के लिए ? अब देखना यह है कि जिम्मेदार अफसर इस खुले राज पर कब आंख खोलते हैं।
कई आरोप, फिर भी ‘क्लीन चिट’ का खेल !
एक–दो नहीं, बल्कि कई गंभीर आरोप लगने के बावजूद बड़े साहब पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े करता है। दर्जन भर जनहित से जुड़ी जांच फाइलों में सिमटी रह गई, कार्रवाई कागज़ों से बाहर नहीं आई।
सूत्र बताते हैं कि जिला स्तर के आला अधिकारियों और कुछ जनप्रतिनिधियों से साहब की नज़दीकियां ही उनकी सबसे बड़ी ढाल बनी हुई हैं। समय – समय पर इसका खौफ भी दिखाया जाता हैं।यही वजह है कि संगीन आरोपों के बाद भी सिस्टम खामोश है और जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे हैं।
जरा हट के…
प्रवीण काटकर
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