Home CITY NEWS आदिवासी बच्चों के हक पर लूट !

आदिवासी बच्चों के हक पर लूट !

मौखिक आदेश की आड़ में घटिया खरीदी, प्रिंसिपल–अफसर गठजोड़ बेनकाब

ट्राइबल विभाग के स्कूल बने खरीद–फरोख्त का अड्डा

छिंदवाड़ा (लगी क्या)। जिले के जनजातीय कार्य विभाग के हाई और हायर सेकेंडरी स्कूल अब शिक्षा के नहीं, बल्कि कमीशनखोरी और संदिग्ध खरीदी के केंद्र बनते जा रहे हैं। हालात यह हैं कि स्कूलों में किताबों और शिक्षकों की जगह घटिया फर्नीचर, टूटा-फूटा सामान और भ्रष्टाचार की गूंज सुनाई दे रही है।
भोपाल की फर्म ने जिले भर में सप्लाई की है ।
सवालों के घेरे में खरीदी-
आरोप है कि भोपाल की रेवा इंटरप्राइजेज नामक फर्म से हररई, बिछुआ और तामिया के ट्राइबल स्कूलों में लाखों रुपये का सामान सप्लाई कराया गया। न टेंडर, न कोटेशन, न तुलना, बस एक ‘मौखिक आदेश’ और खेल खत्म।
जो सामान पहुंचा, उसकी हालत ऐसी कि शिक्षक ही कह रहे हैं—
“इसे फर्नीचर कहना फर्नीचर का अपमान है, यह तो सीधा कबाड़ है।”

प्रिंसिपल बने कमीशन एजेंट ? –

सूत्रों का दावा है कि इस पूरे खेल में कुछ स्कूल प्रिंसिपल शिक्षक नहीं, कमीशन एजेंट की भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं। नियमों को ताक पर रखकर, वरिष्ठ अधिकारी के नाम की ढाल लेकर खरीदी कराई गई। सब कुछ इतना “सुव्यवस्थित” था कि सवाल पूछने की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी गई।
सामान आया, लेकिन शिक्षा लापता-

स्कूल परिसरों में डेस्क–बेंच, रैक और अन्य सामग्री तो खड़ी है, लेकिन
एक महीने में फर्नीचर टूटने लगा
वेल्डिंग, लकड़ी और फिटिंग घटिया
मरम्मत लायक भी नहीं छोड़ा गया।
वहीं पढ़ाई की स्थिति यह है कि
छात्र हिंदी ठीक से पढ़ नहीं पा रहे
बुनियादी गणित भी सिर के ऊपर से गुजर रहा है
सवाल साफ है , अगर यही “विकास” है, तो शिक्षा कहां है ? बच्चों का भविष्य, अफसरों की सौदेबाज़ी जनजातीय अंचल पहले ही शैक्षणिक पिछड़ेपन से जूझ रहे हैं। ऐसे में घटिया सामग्री थोपना और शिक्षण की अनदेखी करना, सीधे-सीधे आदिवासी बच्चों के भविष्य पर हमला है।

तामिया में बिजली की रफ्तार से पेमेंट ! –
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि
जहां एक ओर गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे थे, वहीं दूसरी ओर तामिया में अधिकारियों और प्रिंसिपलों की साठगांठ से कंपनी को पूरा भुगतान फटाफट जारी कर दिया गया। न जांच, न आपत्ति, न जवाबदेही—बस फाइल चली और पैसा निकल गया।
बड़ा सवाल यह है कि बिना टेंडर खरीदी किसका आदेश ? ‘मौखिक आदेश’ देने वाला अधिकारी आखिर कौन ?, घटिया सामान की जांच कब तक ? जिम्मेदारों पर कार्रवाई या फिर फाइलों में दफन होगा मामला ? ऐसे कई अनगिनत सवाल है जो अब भी अनसुलझे है। अगर यही हाल रहा, तो ट्राइबल विभाग के स्कूल शिक्षा के नहीं, घोटालों के मॉडल बन जाएंगे।

जरा हट के…

प्रवीण काटकर

9424300567