Home CITY NEWS ट्रांसफर नहीं मिला तो ‘आराम’ पक्का !

ट्रांसफर नहीं मिला तो ‘आराम’ पक्का !

           खबर का असर

ट्रांसफर के लिए एक लाख की बोली,
जुगाड़ फेल तो जनजाति कार्यालय में “आरामदेह अटैचमेंट”

छिंदवाड़ा — जनजाति कार्य विभाग में ट्रांसफर और अटैचमेंट अब प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लेन–देन का खुला खेल बन चुका है। विभाग में सालभर ट्रांसफर के नाम पर लाखों रुपये की उगाही की जाती है, और ताज़ा मामला इस पूरे सिस्टम की पोल खोलता है।
सूत्रों के मुताबिक, एक लिपिक ने मनपसंद ट्रांसफर के लिए एक लाख रुपये का चढ़ावा चढ़ाया। लेकिन जब “ साहब ” का जुगाड़ ऊपर तक फिट नहीं हो पाया, तो ट्रांसफर की जगह कार्यालय में अटैचमेंट का तोहफ़ा थमा दिया गया। लेकिन अब पैसा भी गया और कुछ दिन के आराम के बाद वापसी भी, यही नहीं, यह कोई एकल मामला नहीं है। विभाग में पहले भी कई लिपिकों और शिक्षकों को स्कूलों से हटाकर कार्यालयों में अटैच किया गया है, ताकि बिना फील्ड वर्क के पूरी तनख़्वाह और आराम मिल सके। नतीजा साफ़ है, स्कूलों में पढ़ाई चौपट, कार्यालयों में भीड़ और सेटिंग, और बच्चों की शिक्षा से खुला खिलवाड़ , सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन अटैचमेंट आदेशों की अनुमति कौन दे रहा है ? और क्या जनजाति कार्य विभाग ट्रांसफर माफिया का स्थायी अड्डा बन चुका है ?

खबर का असर, रिलीव हुए कुछ कर्मचारी –
जनजाति कार्य विभाग में नियमों को दाग पर रखकर मुख्यालय में किए गए अटैचमेंट की खबर को “लगी क्या” द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने के बाद आनन फानन में कलेक्टर की फटकार के पास सहायक आयुक्त में सभी अटैचमेंटों को समाप्त करते हुए उन्हें पुनः अपनी जगह भेज दिया। लेकिन इस मामले में कुछ चाहते कर्मचारी अभी अटैचमेंट में आरामगाह में है।

जरा हट के…

प्रवीण काटकर

9424300567